मंदिर सेवा और भोग-प्रसाद

पुराने मंदिरों का संरक्षण और उनमें भोग-प्रसाद की व्यवस्था के पुनरारंभ से मृतप्राय संस्कृति जीवंत हो उठेगी। विशाल भारतवर्ष के लगभग हर गांव कस्बे में ऐसे पुराने बंद मंदिर या देवस्थान जरुर मिल जाएंगे जो बीहड़ बन रहे हैं अथवा बन चुके हैं।

सांस्कृतिक - आध्यात्मिक दृष्टि से

यह शुभ संकेत नहीं। राष्ट्र और समाज के लिए यह विघटन घातक सिद्ध होगा। अतः अपनी रचनात्मक योजना के तहत अभ्युदय मंच किसी भी गांव, कस्बे या नगर में अवस्थित ऐसे किसी जीर्ण, क्षीणप्राय
मंदिर अथवा देवस्थान पर जाकर, वहां की स्वच्छता, पूजा पाठ और अन्य सक्रिय गतिविधियों का आयोजन करेंगे।

शास्त्रों की दृष्टि में भी यह पुण्यप्रद कार्य होगा। नये मंदिरों के निर्माण को पुण्यदायी तो माना ही गया है, लेकिन पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार और सेवा बढ़कर पुण्यदायी है।

भोग-प्रसाद व्यवस्था से धार्मिक परंपरा का संरक्षण होता है और समाज में आध्यात्मिक जागरण भी बढ़ता है। ये मंदिर, ये तीर्थस्थल सामाजिक सौहार्द के स्मारक हैं। परस्पर विचार विनिमय और सात्विक संवृ‌द्धि के स्थान हैं। यहां होने वाली गतिविधियों संक्षेप में निम्नलिखित हैं –

विधि / गतिविधियाँ:

  1. पुराने मंदिरों का निरीक्षण और जीर्णोद्धार।
  2. राग, भोग और प्रसाद व्यवस्था – नियमित पूजा एवं सेवा।
  3. सामुदायिक सहभागिता – मंदिर में आने वाले सभी श्रद्धालुओं को सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित करना।

संदेश / लाभः

  1. समाज में धार्मिक और नैतिक मूल्यों का प्रसार।
  2. पुराने मंदिरों के संरक्षण से संस्कृति और परंपरा की सातत्यता।
  3. बच्चों और युवाओं में भक्ति और सेवा भाव का विकास।
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